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Showing posts from September, 2013

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Shri JINManiprabhSURIji ms. खरतरगच्छाधिपतिश्री जहाज मंदिर मांडवला में विराज रहे है।

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पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य प्रवर श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. एवं पूज्य आचार्य श्री जिनमनोज्ञसूरीजी महाराज आदि ठाणा जहाज मंदिर मांडवला में विराज रहे है। आराधना साधना एवं स्वाध्याय सुंदर रूप से गतिमान है। दोपहर में तत्त्वार्थसूत्र की वाचना चल रही है। जिसका फेसबुक पर लाइव प्रसारण एवं यूट्यूब (जहाज मंदिर चेनल) पे वीडियो दी जा रही है । प्रेषक मुकेश प्रजापत फोन- 9825105823

SHREE PARSWAMANI TIRTH

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JAY JAY SHREE AADINATH JAY JAY SHREE PARSWANATH

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JAY JAY SHREE AADINATH  JAY JAY SHREE  PARSWANATH JAY JAY SHREE AADINATH  JAY JAY SHREE  PARSWANATH

जीवन तो युवावस्था का ही

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-मणिप्रभसागर जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आयोजित ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- हमें समझ ही नहीं आता और जिन्दगी पूरी हो जाती है। जिन्दगी का अर्थ समझ में आने से पहले ही हमारी अर्थी निकल जाती है।

Nice Story

अदभुत कथा- लिखने वाले व्यक्ति को तहे दिल से नमन....... कहानी कुछ यूँ है-------- .................................................................................. इस साल मेरा सात वर्षीय बेटा दूसरी कक्षा मैं प्रवेश पा गया .... क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है ! पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया ! बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है वो अभी इस साल काम दे सकते हैं! अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा ! मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद बहुत प्यार करता है इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रहा है ! खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा..... दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली ... डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी..... फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा !!!! मैंने बेटे से कहा :बेटा ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है तो फ

Ajitshanti Stotra by Maniprabhsagarji ms

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kalash, dhwaja, jain flag, flag,

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Namiun Stotra by Maniprabhsagarji ms

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Namiun Stotra by Maniprabhsagarji ms jahaj mandir, maniprabh, mehulprabh, kushalvatika, JAHAJMANDIR, MEHUL PRABH, kushal vatika, mayankprabh, Pratikaman, Aaradhna, Yachna, Upvaas, Samayik, Navkar, Jap, Paryushan, MahaParv, jahajmandir, mehulprabh, maniprabh, mayankprabh, kushalvatika, gajmandir, kantisagar, harisagar, khartargacchha, jain dharma, jain, hindu, temple, jain temple, jain site, jain guru, jain sadhu, sadhu, sadhvi, guruji, tapasvi, aadinath, palitana, sammetshikhar, pawapuri, girnar, swetamber, shwetamber, JAHAJMANDIR, www.jahajmandir.com, www.jahajmandir.blogspot.in,

सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई

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AVHAN YOGESH SIROYA सबसे छोटा आराधक आव्हान योगेशजी सिरोया मुंबई  jahaj mandir, maniprabh, mehulprabh, kushalvatika, JAHAJMANDIR, MEHUL PRABH, kushal vatika, mayankprabh, Pratikaman, Aaradhna, Yachna, Upvaas, Samayik, Navkar, Jap, Paryushan, MahaParv, jahajmandir, mehulprabh, maniprabh, mayankprabh, kushalvatika, gajmandir, kantisagar, harisagar, khartargacchha, jain dharma, jain, hindu, temple, jain temple, jain site, jain guru, jain sadhu, sadhu, sadhvi, guruji, tapasvi, aadinath, palitana, sammetshikhar, pawapuri, girnar, swetamber, shwetamber, JAHAJMANDIR, www.jahajmandir.com, www.jahajmandir.blogspot.in,

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है? उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुर

Palitana Chaturmaas

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है? उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, च

Palitana Chaturmaas

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 13 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- मैं कौन हूँ, इस प्रश्न से ही धर्म का प्रारंभ होता है। जब तक व्यक्ति अपने आपको नहीं जानता, उसका शेष जानना व्यर्थ है। उन्होंने कहा- आचारांग सूत्र का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है। परमात्मा महावीर ने जो देशना दी थी, उसे सुधर्मा स्वामी ने आगमों के माध्यम से जंबू स्वामी से कहा। परमात्मा फरमाते हैं कि इस दुनिया में अनंत जीव ऐसे हैं जो यह नहीं जानते कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? किस दिशा से आया हूँ? और कहाँ जाना है? उन्होंने कहा- आज आदमी सारी दुनिया को जानता है, अपने पराये को जानता है, रिश्तेदारों और मित्रों को पहचानता है परन्तु यह उसकी सबसे बडी गरीबी है कि वह जानने वाले को नहीं जानता। यह शरीर मेरा स्वरूप नहीं है, क्योंकि शरीर आज है, कल नहीं था, कल नहीं रहेगा! जबकि मैं कल भी था, आज भी हूँ और कल भी रहूँगा! तो वह कौन है जो तीनों काल में है, जिसे कोई मिटा नहीं सकता, चुरा नहीं सक

SAMVATSARI MAHAPARVA NEWS

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 9 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वािधराज संवत्सरी महापर्व के अवसर पर श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- आज क्षमायाचना का महापर्व है। ऐसा कोई व्यक्ति मिलना दुर्लभ है, जिसने अपने जीवन में कभी न कभी कोई न कोई गलती नहीं की हो। मनुष्य मात्र, गलती का पात्र है। लेकिन संवत्सरी का ऐसा विशिष्ट अवसर है, जब हमें अपना मनोमालिन्य धो देना है। अपने द्वारा हुई गलतियों के लिये क्षमा मांगनी है। और दूसरों के द्वारा हुई गलतियों को क्षमा कर देना है। उन्होंने कहा- क्षमा मांगना बहुत आसान है, परन्तु क्षमा करना बहुत मुश्किल है। हमें हमारी गलतियों का स्मरण रहता है। इसलिये हम अपनी गलतियों के लिये बहुत आसानी से क्षमा मांग लेते हैं। परन्तु दूसरों की गलतियाँ हमारे हृदय में बिच्छु के डंक की भांति लगातार चुभती रहती है। उसके

PARYUSHAN PARVA 7th DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 8 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के सातवें दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- जैन शासन में समर्पण और संवेदनशीलता का विशेष महत्व है। आज जैन इतिहास की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा- जैन परम्परा में सैंकडों आचार्य हुए हैं, जिन्होंने अहिंसा और कल्याण की बलिवेदी पर अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया। उन्होंने कहा- कष्टों को रोते हुए भोगने से वे बढते हैं और हंसते हंसते भोगने से उनकी परम्परा समाप्त हो जाती है। उन्होंने परमात्मा आदिनाथ, नेमिनाथ एवं पाश्र्वनाथ के जीवन चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा- इन तीर्थंकरों से राग व द्वेष की परम्परा के दुष्परिणाम समझने हैं और समझ कर राग व द्वेष का त्याग करना है। राग की परम्परा का परिणाम परमात्मा नेमिनाथ के भव हैं। और द्वेष की परम्परा का परि

PARYUSHAN PARVA 6th DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता. 7 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के छठे दिन श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों व अतिथियों की विशाल ध्ार्मसभा के मध्य आज परमात्मा महावीर के जीवन का वृत्तांत सुनाते हुए कहा- परमात्मा महावीर के जीवन की सबसे बडी विशिष्टता है कि उनका आचार पक्ष व विचार पक्ष एक समान था। मात्र उपदेश देने वाले तो हजारों हैं, पर उनका अपना जीवन अपने ही उपदेशों के विपरीत होता है। ऐसे व्यक्ति पूज्य नहीं हुआ करते। पूज्य तो वे ही होते हैं, जिनकी कथनी करणी एक समान हो। उन्होंने कहा- आज विश्व में आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। भौतिकता के विकास ने मानवता का विनाश किया है। सुविधाओं ने शांति के बदले अशांति दी है। दूरसंचार और आवागमन के वाहन साधनों ने विश्व की भौगोलिक दूरी को जरूर कम किया है, पर मनुष्य के बीच हृदय की दूरी अवश्य बढ गई है। आर्थिक लोभवृत्ति ने भाई भाई क

14 SWAPNA

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Jahajmandir, 

PARYUSHAN PARVA 4th DAY

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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन ता . 5 सितम्बर 2013, पालीताना जैन श्वे . खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म . सा . ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के चतुर्थ दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा को संबोिधत करते हुए कहा - जैन आगमों में सर्वाधिक आदरणीय शास्त्र कल्पसूत्र है। क्योकि इसमें जीवन की पद्धति का विश्लेषण है। वर्तमान की घटनाओं को अतीत से जोडकर देखने की अद्भुत दृष्टि कल्पसूत्र का चिंतन हमें देता है। उन्होंने कहा - हम वर्तमान मेें घट रही घटनाओं को केवल वर्तमान के संदर्भ में ही देखते हैं औीर इसी कारण जीवन में तनाव और बैचेनी है। भगवान महावीर के पूर्व भवों का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा - वे पूर्व भव में हमारे जैसे ही सामान्य व्यक्ति थे। जब वे किसान थ